
पटना: बिहार में खून की कमी यानी एनीमिया को लेकर स्वास्थ्य विभाग ने विशेष अभियान शुरू किया है। ‘अनीमिया मुक्त बिहार विशेष अभियान’ 25 अगस्त से 30 नवंबर 2026 तक चलाया जा रहा है। इस दौरान राज्य के स्वास्थ्य संस्थानों में लोगों की हीमोग्लोबिन जांच के साथ एनीमिया की पहचान, इलाज और बचाव को लेकर जागरूकता भी बढ़ाई जाएगी।
बच्चों और महिलाओं की जांच पर खास जोर
अभियान में खास तौर पर 5 से 9 साल के बच्चों, 10 से 19 साल के किशोर-किशोरियों और 20 से 49 साल की महिलाओं को शामिल किया गया है। इसके अलावा गर्भवती और धात्री महिलाओं की भी विशेष जांच की जाएगी। पुरुषों और अन्य पात्र लोगों को भी जरूरत के अनुसार स्क्रीनिंग में शामिल किया जाएगा। स्वास्थ्य विभाग का मकसद सिर्फ एनीमिया की पहचान करना नहीं, बल्कि समय पर उसका इलाज शुरू करना भी है। इसके लिए स्वास्थ्य केंद्रों पर हीमोग्लोबिन की जांच की जाएगी। कई जगह डिजिटल हीमोग्लोबिन जांच मशीनों का इस्तेमाल किया जा रहा है।
जांच के बाद इलाज और फॉलोअप
अगर किसी व्यक्ति में एनीमिया की पुष्टि होती है तो उसकी स्थिति के अनुसार उपचार किया जाएगा। जरूरत पड़ने पर आयरन और फोलिक एसिड की दवा, चिकित्सकीय सलाह और अन्य जरूरी उपचार उपलब्ध कराया जाएगा। मध्यम और गंभीर एनीमिया वाले मरीजों को आगे की जांच और इलाज के लिए बड़े स्वास्थ्य संस्थानों में भेजने की व्यवस्था भी की गई है।
गंभीर मामलों में सिर्फ दवा देकर छोड़ने के बजाय मरीज की आगे भी निगरानी की जाएगी। हाल की स्वास्थ्य विभागीय गतिविधियों में ‘टेस्ट, ट्रीट, टॉक और ट्रेस’ की रणनीति पर जोर दिया गया है, यानी जांच के बाद इलाज, खान-पान की सलाह और मरीज की लगातार निगरानी।
सिर्फ जांच नहीं, पोषण की भी जानकारी
अभियान के दौरान लोगों को एनीमिया से बचने के तरीके भी बताए जाएंगे। स्वास्थ्यकर्मी आयरन से भरपूर भोजन, हरी पत्तेदार सब्जियां, दाल, मोटे अनाज और संतुलित आहार** के बारे में जानकारी देंगे। आयरन-फोलिक एसिड की दवा नियमित लेने और डॉक्टर की सलाह का पालन करने के लिए भी लोगों को जागरूक किया जाएगा।
गांव से लेकर स्वास्थ्य केंद्र तक अभियान
अभियान को सिर्फ अस्पतालों तक सीमित नहीं रखा गया है। स्वास्थ्य केंद्रों के अलावा ग्राम स्वास्थ्य, स्वच्छता एवं पोषण दिवस और प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान जैसे कार्यक्रमों के दौरान भी स्क्रीनिंग की जाएगी। स्कूलों में बच्चों और किशोर-किशोरियों की जांच के लिए स्वास्थ्य टीमों की मदद ली जाएगी। इस अभियान में आशा कार्यकर्ता, एएनएम, सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी, लैब तकनीशियन और स्वास्थ्य विभाग की अन्य टीमें भी काम करेंगी। विभाग का लक्ष्य है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों में खून की कमी की समय पर पहचान हो और उन्हें सही इलाज मिल सके।


