
पटना। बिहार में हर घर नल का जल योजना को लेकर CAG की रिपोर्ट में अहम खुलासा हुआ है। 23 जुलाई 2026 को बिहार विधानसभा में पेश की गई रिपोर्ट में 2017-18 से 2022-23 के दौरान योजना के क्रियान्वयन का ऑडिट किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक इस अवधि में करीब 30,500.92 करोड़ रुपये आवंटित किए गए, लेकिन 46,633 वार्डों में करीब 11.22 लाख परिवार योजना के कवरेज से बाहर रह गए। इनमें लगभग 8.07 लाख परिवार पानी की गुणवत्ता प्रभावित क्षेत्रों में थे।
करीब 30 हजार करोड़ रुपये का हुआ आवंटन
बिहार में हर घर तक पाइप के जरिए साफ पानी पहुंचाने के उद्देश्य से हर घर नल का जल योजना चलाई गई। इसका मकसद ग्रामीण परिवारों को घर पर ही पेयजल उपलब्ध कराना और पुराने जल स्रोतों पर निर्भरता कम करना था।
CAG की रिपोर्ट में 2017-18 से 2022-23 के दौरान योजना के लिए अलग-अलग संबंधित विभागों को मिलाकर करीब 30,500.92 करोड़ रुपये के आवंटन का उल्लेख है। इतनी बड़ी राशि खर्च होने के बाद योजना की वास्तविक स्थिति जानने के लिए CAG ने इसके क्रियान्वयन, निगरानी और गुणवत्ता व्यवस्था की जांच की।
11.22 लाख परिवार योजना से बाहर
ऑडिट में सामने आया कि 46,633 वार्डों में करीब 11.22 लाख परिवार कवरेज से बाहर रह गए थे। इसमें सबसे चिंता वाली बात यह रही कि करीब 8.07 लाख परिवार ऐसे इलाकों में थे, जहां पानी की गुणवत्ता प्रभावित थी। यानी जिन क्षेत्रों में साफ पानी की जरूरत ज्यादा थी, वहां भी बड़ी संख्या में परिवार योजना के दायरे से बाहर पाए गए। इससे यह सवाल उठता है कि केवल नल और पाइपलाइन बिछाना पर्याप्त है या हर परिवार तक नियमित और सुरक्षित पानी पहुंचना भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
कनेक्शन और नियमित पानी में अंतर
रिपोर्ट का एक अहम पहलू यह है कि किसी घर में नल का कनेक्शन होना और उस नल से नियमित पानी मिलना एक जैसी बात नहीं है। सरकारी रिकॉर्ड में कवरेज का आंकड़ा ऊंचा दिखाई दे सकता है, लेकिन जमीन पर यह देखना जरूरी है कि कितने घरों में रोज पानी पहुंच रहा है और पानी पीने योग्य है या नहीं।
रिपोर्ट से सामने आई जानकारी के अनुसार PHED ने मार्च 2023 तक लक्षित ग्रामीण परिवारों के 98.70 प्रतिशत कवरेज का दावा किया था। वहीं जल जीवन मिशन के डैशबोर्ड पर नवंबर 2025 में कवरेज 95.71 प्रतिशत बताया गया था।
निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल
CAG ने योजना की निगरानी और गुणवत्ता नियंत्रण से जुड़ी व्यवस्थाओं में भी कमियां बताई हैं। रिपोर्ट के अनुसार डिजिटल मॉनिटरिंग सिस्टम की विश्वसनीयता और उसके इस्तेमाल को लेकर सवाल सामने आए। इसके अलावा सामुदायिक भागीदारी के लिए बनाई गई जल चौपाल व्यवस्था का उपयोग भी सीमित पाया गया।
इसका मतलब है कि योजना के तहत काम कराने के साथ-साथ उसकी निगरानी व्यवस्था को मजबूत करना भी जरूरी है, ताकि यह पता चलता रहे कि योजनाएं वास्तव में काम कर रही हैं या नहीं।
गलत जगह फ्लोराइड प्लांट लगाने का मामला
रिपोर्ट में फ्लोराइड प्रभावित इलाकों से जुड़ा एक मामला भी सामने आया। CAG के मुताबिक 15 योजनाओं में करीब 2.77 करोड़ रुपये खर्च कर फ्लोराइड रिमूवल प्लांट ऐसे वार्डों में लगाए गए, जहां फ्लोराइड का स्तर निर्धारित सीमा से अधिक नहीं था। वहीं दूसरी तरफ पानी की गुणवत्ता से प्रभावित क्षेत्रों में बड़ी संख्या में परिवार योजना के कवरेज से बाहर पाए गए। इससे योजना की प्लानिंग और जरूरत के हिसाब से संसाधनों के इस्तेमाल पर सवाल खड़े होते हैं।



