Jharkhand News: झारखंड के आदिवासी मुद्दों को यूएन फोरम पर उठाया, पूर्व विधायक कुणाल षाड़ंगी ने जादूगोड़ा खनन पर की नजर, 50 देशों के प्रतिनिधि शामिल
कुणाल षाड़ंगी ने कहा- 60 सालों से यूरेनियम खनन से संथाल, हो, मुंडा समुदाय विस्थापित और कैंसर जैसी बीमारियों का शिकार हो रहे हैं।

Jharkhand News: झारखंड मुक्ति मोर्चा के केंद्रीय प्रवक्ता और पूर्व विधायक कुणाल षाड़ंगी ने संयुक्त राष्ट्र के जेनेवा स्थित 14वें वार्षिक बिजनेस एंड ह्यूमन राइट्स फोरम में झारखंड के आदिवासी समुदायों से जुड़े गंभीर मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। इस अंतरराष्ट्रीय मंच पर 50 से अधिक देशों के प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं, जहां विकासशील देशों में व्यापारिक गतिविधियों और मानवाधिकारों के बीच टकराव पर गहन चर्चा हो रही है। षाड़ंगी ने विशेष रूप से जादूगोड़ा में यूरेनियम खनन से होने वाले आदिवासी विस्थापन, स्वास्थ्य हानि और पर्यावरणीय क्षति का मामला रखा। उनका यह प्रयास आदिवासी अधिकारों को वैश्विक पटल पर मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।
जादूगोड़ा खनन का काला अध्याय: 60 सालों से आदिवासी समुदाय पर संकट
कुणाल षाड़ंगी ने फोरम में यूरेनियम कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (UCIL) द्वारा जादूगोड़ा में पिछले 60 वर्षों से चली आ रही खनन गतिविधियों पर रोशनी डाली। उन्होंने बताया कि संथाल, हो, मुंडा और उरांव जैसे आदिवासी समुदाय बड़े पैमाने पर विस्थापित हो चुके हैं। यूरेनियम विकिरण से कैंसर जैसी गंभीर बीमारियां फैल रही हैं, और स्थानीय पर्यावरण पूरी तरह बर्बाद हो गया है। षाड़ंगी ने कहा, “यह खनन न केवल जमीन छीन रहा है, बल्कि आदिवासियों की जिंदगी को भी तबाह कर रहा है। भारत सरकार ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ के नाम पर इन आंकड़ों को छिपा रही है। उन्होंने ऑफिशियल सीक्रेट एक्ट, 1923 का हवाला दिया, जिसके तहत UCIL की उत्पादन क्षमता और डेटा सार्वजनिक नहीं होता। सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 भी अप्रभावी साबित हो रहा है, क्योंकि परमाणु ऊर्जा से जुड़ी जानकारियां सुरक्षा के दायरे में आ जाती हैं।
राज्य सरकारों को भूमि अधिग्रहण के अलावा कोई भूमिका नहीं मिलती, जो विकास की प्रक्रिया को और जटिल बना देती है।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का समर्थन: राज्य सरकारों को अधिक अधिकार की मांग
षाड़ंगी ने झारखंड मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के विचारों का हवाला देते हुए कहा कि आदिवासियों की जमीन उनकी सबसे बड़ी पूंजी है। “ऐसा कोई औद्योगीकरण स्वीकार नहीं किया जा सकता, जो उनकी जमीन छीनने के बाद उनके अधिकारों की रक्षा न करे।” उन्होंने राज्य सरकारों को अधिक प्रशासनिक अधिकार देने की मांग दोहराई। फोरम में षाड़ंगी ने संयुक्त राष्ट्र से भारत सरकार के साथ सख्त संवाद करने की अपील की। ताकि आदिवासी समुदायों के साथ हो रहे ऐतिहासिक अन्याय पर लगाम लग सके। उनका कहना था कि वैश्विक मंचों पर इन मुद्दों को उठाने से अंतरराष्ट्रीय सहयोग मिलेगा और स्थानीय स्तर पर बदलाव संभव होगा।
फोरम के बाद व्यक्तिगत मुलाकात: यूएन वर्किंग ग्रुप की अध्यक्ष से चर्चा
फोरम की कार्यवाही के बाद कुणाल षाड़ंगी ने संयुक्त राष्ट्र के वर्किंग ग्रुप ऑन बिजनेस एंड ह्यूमन राइट्स की अध्यक्ष पिचामोन योफानथोंग से अलग से मुलाकात की। इस दौरान जादूगोड़ा मुद्दे पर विस्तृत बातचीत हुई। षाड़ंगी ने उम्मीद जताई कि फोरम के अंतिम मसौदे और सिफारिशों में इस विषय को प्रमुख स्थान मिलेगा। इससे आदिवासी अधिकारों को वैश्विक मान्यता मिलेगी और भारत सरकार पर दबाव बनेगा। योफानथोंग ने मुद्दे की गंभीरता को स्वीकार किया और आगे की कार्रवाई का आश्वासन दिया।
यह पहल झारखंड के आदिवासी समुदायों के लिए एक नई उम्मीद की किरण है। जादूगोड़ा जैसे इलाकों में लंबे समय से चली आ रही समस्याओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रखना निश्चित रूप से बदलाव ला सकता है। षाड़ंगी का प्रयास आदिवासी संघर्ष को वैश्विक पटल पर ले जाने का सफल उदाहरण बन गया है। उम्मीद है कि इससे स्थानीय स्तर पर भी सकारात्मक कदम उठेंगे।



