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Bihar News: बिहार में नई शिक्षा नीति का क्रियान्वयन ठप, छात्रों को यूजीसी की सुविधाओं से वंचित होना पड़ रहा, सरकार पर सवाल

नीति निर्धारकों में एकेडमिक सोच की कमी मुख्य बाधा, अन्य राज्यों में साल में दो बार दाखिला शुरू, लेकिन बिहार में कोई व्यवस्था नहीं।

Bihar News: बिहार में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) को लागू करने में राज्य की उदासीनता ने उच्च शिक्षा व्यवस्था को गहरी चोट पहुंचाई है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की नई गाइडलाइंस के बावजूद बिहार के विश्वविद्यालय तैयार नहीं हैं, जिससे छात्रों को लचीली दाखिला प्रक्रिया, दोहरी डिग्री और स्किल कोर्स के लाभ से महरूम रहना पड़ रहा है। शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यह विफलता छात्रों के भविष्य को दांव पर लगा रही है। राज्य सरकार ने 2020 में नीति को अपनाने की घोषणा तो की, लेकिन क्रियान्वयन में कोई प्रगति नहीं हुई।

Bihar News: एनईपी क्रियान्वयन में बिहार की पिछड़ापन

बिहार में एनईपी को लागू करने की सबसे बड़ी बाधा नीति निर्धारकों में एकेडमिक दृष्टिकोण का अभाव है। राज्य सरकार उच्च शिक्षा पर केवल वेतन-पेंशन का खर्च वहन कर रही है, लेकिन कोई ठोस कार्य योजना नहीं बना रही। महागठबंधन शासनकाल में तत्कालीन शिक्षा मंत्री डॉ. चंद्रशेखर ने एनईपी को केंद्र की सोच बताकर खारिज कर दिया था। एनडीए सरकार बनने के बाद भी स्थिति जस की तस है। अन्य राज्यों में अगले सत्र से साल में दो बार (जुलाई-अगस्त और जनवरी-फरवरी) दाखिला शुरू हो जाएगा। छात्र एक सत्र में दो यूजी-पीजी कोर्स कर सकेंगे, और दोनों डिग्री वैध मानी जाएंगी। लेकिन बिहार में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। पिछले पांच वर्षों में केवल सेमेस्टर सिस्टम लागू हुआ, जबकि पटना विश्वविद्यालय को छोड़कर अधिकांश संस्थानों में सत्र संचालन सुचारू नहीं है।

छात्रों पर असर: लचीली व्यवस्था से वंचित, उच्च शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित

इस लापरवाही का सबसे बड़ा शिकार बिहार के छात्र हैं। यूजीसी की नई गाइडलाइन में छात्रों को मनचाहे कोर्स में प्रवेश, पढ़ाई बीच में छोड़कर फिर दाखिला लेने और वोकेशनल-स्किल कोर्स के क्रेडिट को डिग्री में जोड़ने का प्रावधान है। लेकिन बिहार के विश्वविद्यालयों में यह सुविधा उपलब्ध नहीं है। छात्रों को अन्य राज्यों की तुलना में पीछे रहना पड़ रहा है। रजिस्ट्रेशन बढ़ाने का अवसर चूक रहा है, और अकादमिक माहौल कमजोर हो गया है। उदाहरण के तौर पर, बिहार के विश्वविद्यालयों में अगले सत्र से कितने कोर्स में दाखिला संभव होगा, यह अनिश्चित है। इससे छात्रों का ड्रॉपआउट रेट बढ़ रहा है।

भविष्य की चुनौतियां: सरकार की उदासीनता जारी रही तो और नुकसान

उच्च शिक्षा निदेशालय से जुड़े एक अधिकारी ने स्वीकार किया कि बिहार अन्य राज्यों से पीछे है। कुलपतियों ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि यूजीसी गाइडलाइन के लिए तैयारी अधर में लटकी है। अगर यह उदासीनता जारी रही तो छात्रों को और नुकसान होगा। विशेषज्ञों का कहना है कि राज्य को तुरंत कार्य योजना बनानी चाहिए। अन्य राज्यों की तरह गंभीरता अपनाकर ही एनईपी के लाभ छात्रों तक पहुंचेंगे।

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