नालंदा यूनिवर्सिटी-CSIR-TKDL के बीच करार, पारंपरिक ज्ञान पर छात्र करेंगे शोध, भारतीय ज्ञान विरासत को मिलेगा वैश्विक मंच
यूनिवर्सिटी और CSIR-TKDL की साझेदारी में पारंपरिक ज्ञान, बौद्धिक संपदा अधिकार और बिहार की सांस्कृतिक विरासत पर रिसर्च और प्रशिक्षण को बढ़ावा दिया जाएगा।

पटना। बिहार की ऐतिहासिक विरासत को आधुनिक शोध से जोड़ने की दिशा में एक अहम कदम उठाया गया है। नालंदा यूनिवर्सिटी और CSIR-ट्रेडिशनल नॉलेज डिजिटल लाइब्रेरी (CSIR-TKDL) यूनिट के बीच 1 अक्टूबर 2026 को MoU साइन हुआ है। इस समझौते का मुख्य उद्देश्य भारत के पारंपरिक ज्ञान, बौद्धिक संपदा अधिकार यानी IPR, लोगों के अधिकार और सांस्कृतिक विरासत पर मिलकर काम करना है। खास तौर पर बिहार की पारंपरिक और सांस्कृतिक विरासत को दस्तावेज के रूप में सुरक्षित करने पर जोर रहेगा।
किन मुद्दों पर होगा काम?
MoU के तहत दोनों संस्थान Traditional Knowledge (TK), Intellectual Property Rights (IPR), People’s Rights और Cultural Heritage से जुड़े विषयों पर अकादमिक और शोध गतिविधियां चलाएंगे। इसमें Traditional Cultural Expressions यानी पारंपरिक सांस्कृतिक अभिव्यक्तियां भी शामिल हैं।
इसके अलावा छात्रों और शोधार्थियों के लिए प्रशिक्षण, इंटर्नशिप, एक्सचेंज विजिट और अकादमिक नेटवर्किंग जैसी गतिविधियां भी प्रस्तावित हैं। इससे विद्यार्थियों को पारंपरिक ज्ञान और उसके संरक्षण से जुड़े विषयों को व्यावहारिक रूप से समझने का मौका मिलेगा।
बिहार की विरासत पर खास ध्यान
इस साझेदारी में बिहार की सांस्कृतिक विरासत को खास महत्व दिया गया है। इसमें स्थानीय समुदायों का पारंपरिक पर्यावरणीय ज्ञान, लोककथाएं, संगीत और दूसरी सांस्कृतिक परंपराओं को पहचानने, दर्ज करने और सुरक्षित रखने की दिशा में काम किया जा सकता है। नालंदा यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रो. सचिन चतुर्वेदी ने कहा कि TKDL के साथ सहयोग से पारंपरिक ज्ञान और पारंपरिक सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों की पहचान, दस्तावेजीकरण और प्रसार के प्रयासों को मजबूती मिलेगी। उन्होंने IPR को लेकर युवाओं में जागरूकता और प्रशिक्षण की जरूरत पर भी जोर दिया।
पारंपरिक ज्ञान के गलत इस्तेमाल पर रोक में मदद
CSIR-TKDL भारत के पारंपरिक ज्ञान को डिजिटल रूप में दस्तावेज करने और उसके गलत पेटेंट दावों या अनुचित इस्तेमाल से बचाने के प्रयासों से जुड़ा है। MoU के जरिए इस क्षेत्र में शोध और जागरूकता को विश्वविद्यालय स्तर पर आगे बढ़ाने की कोशिश होगी। CSIR-TKDL यूनिट की प्रमुख डॉ. विश्वजननी जे. सत्तिगेरी ने कहा कि नालंदा की ऐतिहासिक पहचान और TKDL के काम के बीच यह सहयोग भारत, खासकर बिहार की सांस्कृतिक विरासत पर केंद्रित शोध को नई दिशा दे सकता है।
छात्रों और शोधार्थियों को मिलेगा फायदा
इस समझौते का एक महत्वपूर्ण हिस्सा capacity building यानी प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण है। दोनों संस्थानों के बीच छात्र इंटर्नशिप, एक्सचेंज विजिट और ज्ञान के आदान-प्रदान से जुड़े कार्यक्रम हो सकते हैं। इससे पारंपरिक ज्ञान को केवल इतिहास का हिस्सा मानने के बजाय उसे आधुनिक शोध, IPR और अकादमिक अध्ययन से जोड़ने का अवसर मिलेगा। दोनों संस्थानों को उम्मीद है कि यह सहयोग राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 और राष्ट्रीय IPR नीति 2016 में पारंपरिक ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत से जुड़े उद्देश्यों को आगे बढ़ाने में भी योगदान देगा।



