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Bihar Budget Session: तेजस्वी यादव के बयान पर भारी हंगामा, माफी की मांग ने सदन को बनाया रणक्षेत्र

तेजस्वी यादव के रामविलास पासवान पर कथित बयान से सदन रणक्षेत्र बना, LJP-R के नेता ने माफी की मांग की, स्पीकर की अपील बेअसर।

Bihar Budget Session: बिहार विधानमंडल के बजट सत्र में सोमवार को कार्यवाही शुरू होते ही जबरदस्त हंगामा देखने को मिला। पक्ष और विपक्ष के सदस्य हाथों में तख्तियां लेकर खड़े हो गए और एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप की बौछार करने लगे। मुख्य मुद्दा नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव का दिवंगत नेता रामविलास पासवान पर दिया गया कथित विवादास्पद बयान बना, जिसके लिए सत्तापक्ष के सदस्यों ने सदन में ही माफी की मांग की। विधानसभा अध्यक्ष की बार-बार अपील के बावजूद सदस्य नहीं माने और ‘हाय-हाय’ के नारे गूंजते रहे। इस बीच प्रश्नकाल किसी तरह शुरू हुआ, लेकिन सदन का माहौल तनावपूर्ण बना रहा। यह घटना बिहार की राजनीति में बढ़ते वैचारिक टकराव को उजागर करती है, जहां व्यक्तिगत टिप्पणियां अब सार्वजनिक बहस का केंद्र बन रही हैं।

हंगामे की शुरुआत और तत्काल प्रतिक्रिया

सदन की कार्यवाही सुबह 11 बजे शुरू हुई, लेकिन जैसे ही स्पीकर ने सत्र की शुरुआत की घोषणा की, लोक जनशक्ति पार्टी (राष्ट्रीय) के विधायक दल नेता राजू तिवारी खड़े हो गए। उन्होंने तेजस्वी यादव पर आरोप लगाया कि उन्होंने हाल ही में एक सार्वजनिक मंच पर रामविलास पासवान के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी की है, जो बिहार की राजनीति के एक प्रमुख दलित नेता थे। तिवारी ने कहा, “यह बयान न केवल पासवान जी की स्मृति का अपमान है, बल्कि दलित समाज की भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला है। तेजस्वी यादव को सदन में आकर सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी चाहिए।”

इस मांग के साथ ही सदन में अफरा-तफरी मच गई। विपक्षी सदस्य, मुख्य रूप से राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के, तख्तियां लेकर खड़े हो गए, जिन पर सत्तापक्ष के खिलाफ नारे लिखे थे। जवाब में सत्ताधारी जनता दल (यूनाइटेड) और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के सदस्य भी अपने स्थानों से उठे और प्रतिवाद में तख्तियां लहराने लगे। दोनों पक्षों के बीच नारेबाजी इतनी तेज हो गई कि स्पीकर को कई बार माइक पर चिल्लाकर शांति की अपील करनी पड़ी। उन्होंने कहा, “सदस्यगण कृपया अपनी सीटों पर बैठें और सदन की गरिमा बनाए रखें। यह बहस का मंच है, हंगामे का नहीं।” लेकिन उनकी अपील बेअसर रही और करीब 15 मिनट तक सदन रणक्षेत्र बना रहा।

यह हंगामा ऐसे समय हुआ जब बजट सत्र में महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा होनी थी, जैसे राज्य का आर्थिक विकास, शिक्षा सुधार और कानून-व्यवस्था। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटना सत्र की उत्पादकता को प्रभावित कर सकती है, क्योंकि व्यक्तिगत विवाद अब नीतिगत बहसों पर हावी हो रहे हैं।

राजनीतिक पृष्ठभूमि और विवाद की जड़ें

यह विवाद बिहार की जटिल राजनीतिक गठबंधनों से जुड़ा है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अगुवाई वाली एनडीए सरकार और आरजेडी-कांग्रेस गठबंधन के बीच पहले से ही तनाव है। रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी अब दो धड़ों में बंटी है – एक चिराग पासवान के नेतृत्व में और दूसरी पारस पासवान के। राजू तिवारी पारस गुट से जुड़े हैं, जो वर्तमान में एनडीए का हिस्सा है। तेजस्वी यादव का कथित बयान एक चुनावी रैली में दिया गया था, जहां उन्होंने पासवान की राजनीतिक विरासत पर सवाल उठाए थे। हालांकि, आरजेडी ने इस बयान को संदर्भ से बाहर बताकर खारिज किया है।

बिहार की राजनीति में व्यक्तिगत हमले नई बात नहीं हैं। 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद से राज्य में राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ा है, जहां जातीय समीकरण और विकास के मुद्दे एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। नीतीश कुमार की सरकार ने हाल ही में कई फैसले लिए हैं, जो विपक्ष को निशाना बनाने के लिए इस्तेमाल हो रहे हैं। उदाहरण के लिए, मुख्यमंत्री ने पूर्व सैनिकों की सीधी भर्ती की घोषणा की है, जिसके तहत बिहार में 5,000 से अधिक पूर्व सैनिकों को सरकारी नौकरियों में प्राथमिकता दी जाएगी। यह योजना सेना से सेवानिवृत्त होने वालों के लिए पुनर्वास का एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन विपक्ष इसे चुनावी स्टंट बता रहा है।

इसी तरह, शिक्षा क्षेत्र में भी बदलाव हो रहे हैं। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) ने नीट यूजी 2026 के लिए एक बड़ा फैसला लिया है, जिसमें फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथ्स (पीसीएम) स्ट्रीम के छात्रों को भी मेडिकल कोर्स में प्रवेश की अनुमति दी गई है, बिना बायोलॉजी की अनिवार्यता के। यह बदलाव उन छात्रों के लिए राहत है जो विज्ञान की अन्य शाखाओं में मजबूत हैं, लेकिन विपक्ष इसे शिक्षा की गुणवत्ता पर असर डालने वाला बता रहा है। पटना में अतिथि शिक्षकों का दो दिवसीय धरना भी जारी है, जहां वे नियमितीकरण की मांग कर रहे हैं। हजारों शिक्षक सड़कों पर उतरे हैं, जो राज्य की शिक्षा व्यवस्था में असंतोष को दर्शाता है।

सदन में कानून-व्यवस्था और अन्य मुद्दों पर बहस

हंगामे के बीच प्रश्नकाल में कुछ मुद्दे उठे, जैसे बिहार पुलिस पोर्टल का लॉन्च। यह पोर्टल अपराधियों पर नकेल कसने के लिए एक ‘ब्रह्मास्त्र’ की तरह काम करेगा, जहां रीयल-टाइम डेटा शेयरिंग से अपराध की रोकथाम आसान होगी। सरकार का दावा है कि इससे राज्य में अपराध दर 20% तक कम हो सकती है। हालांकि, विपक्ष ने इसे प्रचार बताते हुए कहा कि ग्रामीण इलाकों में पुलिस की कमी अभी भी एक बड़ी समस्या है।

रेलवे से जुड़ी एक सकारात्मक खबर भी चर्चा में रही। भारतीय रेलवे ने एक नई सुविधा शुरू की है, जहां यात्री अपने स्टेशन पहुंचने से पहले फोन कॉल से जगाए जाएंगे। यह ‘वेक-अप कॉल’ सेवा ट्रेन में सोने वालों के लिए वरदान साबित होगी, खासकर लंबी दूरी की यात्राओं में। बिहार जैसे राज्य में, जहां लाखों लोग रोजाना ट्रेन से सफर करते हैं, यह सुविधा लोकप्रिय हो सकती है।

इन मुद्दों के बीच सदन में बजट पर चर्चा की उम्मीद है, लेकिन हंगामा जारी रहने से सत्र की दिशा प्रभावित हो सकती है। राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे विवाद सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाते हैं और जनता के असली मुद्दों से ध्यान भटकाते हैं। बिहार में बेरोजगारी, स्वास्थ्य और बाढ़ जैसी समस्याएं अभी भी प्राथमिक हैं, लेकिन राजनीतिक नाटक इन पर छाया रहता है।

राजनीतिक दलों की रणनीति और भविष्य का प्रभाव

इस घटना ने बिहार की राजनीति में नए समीकरण पैदा कर दिए हैं। एनडीए तेजस्वी यादव को घेरकर विपक्ष को कमजोर करने की कोशिश कर रहा है, जबकि आरजेडी इसे साजिश बता रहा है। तेजस्वी यादव ने सदन के बाहर मीडिया से बातचीत में कहा, “मैंने कोई अपमानजनक बयान नहीं दिया। यह पुरानी बातों को तोड़-मरोड़कर पेश किया जा रहा है। हम जनता के मुद्दों पर लड़ेंगे, व्यक्तिगत आरोपों पर नहीं।” वहीं, सत्तापक्ष के नेता सम्राट चौधरी ने कहा, “माफी मांगना जरूरी है, वरना सदन नहीं चलने देंगे।”

यह सत्र 2026 के अंत तक चल सकता है, जिसमें बजट प्रस्ताव पर विस्तृत बहस होगी। नीतीश कुमार की सरकार ने विकास पर फोकस करने का दावा किया है, लेकिन ऐसे हंगामे सत्र की सफलता पर सवाल उठाते हैं। विपक्ष की रणनीति सरकार को असहज करने की है, जबकि सत्ता पक्ष एकजुट होकर जवाब दे रहा है।

बिहार की जनता इन घटनाओं को कैसे देखती है? ग्रामीण इलाकों में लोग कहते हैं कि राजनीति अब मनोरंजन बन गई है, लेकिन विकास रुक गया है। शहरी क्षेत्रों में शिक्षा और रोजगार के मुद्दे प्रमुख हैं, जहां नीट जैसे बदलाव युवाओं को प्रभावित करेंगे। अतिथि शिक्षकों का प्रदर्शन भी राज्य की शिक्षा नीति पर सवाल उठाता है।

Bihar Budget Session: सदन की गरिमा और जनता की उम्मीदें

बिहार विधानसभा का यह हंगामा एक बार फिर साबित करता है कि राजनीति में संवाद की कमी कितनी हानिकारक हो सकती है। स्पीकर की अपील के बावजूद सदस्यों का व्यवहार सदन की गरिमा को ठेस पहुंचाता है। जनता उम्मीद करती है कि नेता व्यक्तिगत लड़ाइयों से ऊपर उठकर राज्य के विकास पर ध्यान दें। आने वाले दिनों में सत्र कैसे आगे बढ़ेगा, यह देखना दिलचस्प होगा। यदि हंगामा जारी रहा, तो बजट सत्र अधर में लटक सकता है, जो बिहार के लिए नुकसानदेह होगा।

इस बीच, राज्य में अन्य सकारात्मक कदम जैसे पूर्व सैनिकों की भर्ती और पुलिस पोर्टल उम्मीद की किरण हैं। रेलवे की नई सेवा भी आम आदमी की जिंदगी आसान बनाएगी। लेकिन इन सबके बीच राजनीतिक स्थिरता जरूरी है। बिहार, जो भारत का एक महत्वपूर्ण राज्य है, विकास की राह पर आगे बढ़ने के लिए एकजुट प्रयासों की जरूरत है।

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