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दनियावां-शेखपुरा रेलखंड में विवादित जमीन अधिग्रहण का मामला फिर से गरमाया, किसानों ने कहा- जान दे देंगे पर बिना मुआबजा लिए जमीन नहीं देंगे

Sheikhpura: दनियावां से शेखपुरा भाया बिहारशरीफ रेलखंड का निर्माण कार्य बिगत 10 वर्षों से अधर में है। बरबीघा नगर क्षेत्र के नारायणपुर मौजा में जमीन अधिग्रहण को लेकर किसानों एवं जिला प्रशासन के बीच विवाद कारण करीब 2 किलोमीटर रेलवे लाइन का निर्माण कार्य रुका हुआ है। इसी जगह बरबीघा रेलवे स्टेशन का भी निर्माण होना है। उचित मुआबजे की मांग को लेकर किसान हाईकोर्ट चले गए। जिसके बाद सभी कोर्ट के फैसले के इंतजार में हैं। बुधवार को यह मामला एकबार फिर से गरमा गया है।

दरअसल अधिगृहित भूमि पर रेलवे के द्वारा सीमांकन की तिथि जारी की गई है। इसको लेकर जिला प्रशासन के द्वारा तारीख की घोषणा करते हुए पदाधिकारियों एवं पुलिस बलों को प्रतिनियुक्त किया गया है। 25 फरवरी को 31 मार्च तक सीमांकन की तारीख तय हुई है। इस खबर ने किसानों के अंदर लगभग ठंढी चुकी चिंगारी को जैसे हवा मिल गई। आनन-फानन में किसानों ने परसोबीघा मोहल्ले में एक आपात बैठक बुलाई। जिसमें सभी किसानों ने आक्रोश जताते हुए प्रशासन के आदेश का विरोध करने का फैसला किया। साथ ही उनके साथ हकमारी करते हुए मनमानी का आरोप भी लगाया।

किसानों ने सुनाई अपनी व्यथा
बैठक में शामिल रंजीत कुमार, भोला प्रसाद, महेश कुमार, शशिभूषण कुमार, संजय चौधरी, धर्मवीर कुमार, सुरेश प्रसाद, रेणु देवी, भोला प्रसाद, विपिन चौधरी, वरुण कुमार, शांति देवी, शैला देवी, सरिता देवी आदि किसानों ने कहा कि जिला प्रशासन पहले ही न्यायालय के आदेश की अवहेलना करते हुए जान-बुझ कर किसानों के हित की अनदेखी कर है। अब उनका ये नया आदेश हम किसानों को भुखमरी के कगार पर ले जाएगी। ये सरासर नाइंसाफी है।

किसानों ने कहा कि हममें से कई ऐसे किसान हैं, जिनकी सारी भूमि अधिग्रहित हो चुकी है। उनकी आजीविका इसी भूमि में खेती कर चलती है। बिना मुआबजा दिए अगर उसपर निर्माण हो गया तो वे लोग भूखे मर जायेंगे। इनमें से कई ऐसे किसान भी हैं, जिनकी बेटी की शादी मुआबजे की आस में रुकी हुई है। जमीन अधिग्रहण होने के कारण वे जमीन को बेचकर भी अपनी बेटी को नहीं ब्याह सकते। ऐसे एक नहीं कई मामले हैं, ऐसे में हम अपनी जान दे देंगे, पर बिना मुआबजा लिए अपनी जमीन नहीं देंगे।

बैठक करते किसान

क्या है पूरा मामला?
किसानों के मुताबिक जमीन मुआबजे को लेकर 2015 में किसान हाई कोर्ट गए। जिसमें 2019 में फैसला सुनाया गया। इसके तहत हाईकोर्ट के द्वारा 1 जनवरी 2014 को अधुसूचना मानते हुए बाजार मूल्य का उच्चत्तम रेट किसानों को देने की बात की गई। इस आदेश के अनुसार आवासीय भूमि 1.5 लाख प्रति डिसमिल जबकि व्यवसायिक भूमि 5.25 लाख प्रति डिसिमल देना था। जबकि तत्कालीन भू-अर्जन पदाधिकारी संजय कुमार के द्वारा 2011 के न्यूनतम रेट 9 हजार प्रति डिसमिल निर्धारण किया गया। जिसे किसानों ने लेने से इंकार कर दिया और पुनः कोर्ट की अवमानना का परिवार दायर कर दिया। जिसके बाद से इस रेलखंड का निर्माण कार्य अधर में लटका है ।

निर्माणाधीन रेलखंड

क्या कहते हैं पदाधिकारी?
इस संबन्ध में जिला भू अर्जन पदाधिकारी धर्मेश कुमार ने बताया कि किसानों द्वारा लगाया जा रहा आरोप गलत और निराधार है। विभाग की पूरी सहानुभूति किसानों के साथ है। उन्हें उचित मुआवजा भुगतान को लेकर हम सदैव तत्पर भी हैं।मुआवजा को लेकर किसान 2 साल पहले ही हाईकोर्ट में अवमानना दायर कर चुके हैं। विभाग के द्वारा भी हाईकोर्ट में जवाब पेश किया गया है। इसके लिए हम सभी को न्यायालय के आदेश का इंतजार करना होगा। न्यायालय का जो भी आदेश होगा उसका अक्षरशः पालन किया जाएगा। उन्होंने कहा कि रेलखण्ड का निर्माण कार्य बन्द रहने से क्षेत्र का विकास बाधित हो रहा है। प्रशासन सिर्फ क्षेत्र का विकास एवं क्षेत्रवासियों के भला चाहती है। इसके लिए रेलखंड का निर्माण होना बहुत जरूरी है। इसमें किसानों के साथ-साथ अन्य लोगों को भी अपेक्षित सहयोग करना चाहिए। ताकि रेलखंड का निर्माण हो और क्षेत्र के लोगों का भला हो सके।

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