खेती-बाड़ीशेखपुरा

सरकारी मदद के अभाव में गायब हो रही गन्ने की मिठास, गन्ना उत्पादकों ने बयां किया अपना दर्द

Sheikhpura: शेखोपुरसराय प्रखंड क्षेत्र के लगभग एक दर्जन गांवों में बड़े पैमाने पर गन्ने की खेती की जाती है। यहां का गन्ना आस-पास के तीन जिलों में अपनी सोंधी मिठास बिखेरता है। इसकी मिठास नवादा, नालंदा और शेखपुरा जिले के लोगों को खूब भाती है। गन्ना के रस से यहां के किसान रावा, गुड़ और चक्की बनाते हैं। इन गावों के किसानों के लिए गन्ना की खेती कमाई का मुख्य जरिया भी बन गया है। करीब पांच हजार किसानों का जीवन यापन इसकी खेती पर ही निर्धारित है। गन्ना उत्पादक किसानों की टीस इतनी भर है कि सरकार जिस तरह से अन्य फसलों की खेती के लिए किसानों को मदद देती है, वही मदद गन्ना उत्पादकों को भी दी जाए।

दरअसल तीन दशक पहले नवादा के वारिसलीगंज स्थित चीनी मिल के बंद होने के बाद यहां के किसानों ने गन्ना की खेती को लगभग बंद कर दिया था। लेकिन लोकल बाजार में गन्ना से बने राबा, गुड़ और चक्की की डिमांड बढ़ने पर गन्ना की खेती ने एक बार फिर से जोर पकड़ लिया। वर्तमान में प्रखंड के नीमी, अंबारी, पन्हेशा, मोहब्बतपुर, खुड़िया, चरुआवां, सुगिया सहित एक दर्जन गांवों के चार सौ हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि पर गन्ने की खेती होती है। जिले में अन्य स्थानों पर भी इसकी खेती होती है। परंतु शेखोपुरसराय में उपजे गन्ने की मिठास का कोई का जोड़ नहीं है।
फसल का एक कतरा नहीं होता बर्बाद
गन्ना उपजाने वाले किसान फसल का एक कतरा भी बर्बाद नहीं होने देते हैं। नीमी गांव के किसान दिनेश सिंह, चंद्रमौली सिंह, नागमणी सिंह ने बताया कि गन्ने की फसल तैयार होने पर सभी किसान रस निकालने वाली मशीन कालेशर को लेकर खेत पर ही चले जाते हैं। खेत के पास ही झोपड़ी डालकर पूरे छह माह रहते हैं। कटाई के बाद मशीन से रस निकाल लिया जाता है और अवशेष को सुखाकर जलावन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। रस से रावा, गुड़ और चक्की गुड़ बनाया जाता है। अक्टूबर से शुरू होकर यह कार्य तक जून माह तक चलता है।

कभी-कभी खड़ी फसल को बेचना मजबूरी
इस वर्ष भी किसानों को भारी समस्याओं का सामना करना पड़ा है। इस बार काफी मात्रा में फसल को जंगली जानवरों के द्वारा नुकसान पहुंचाया गया। जिससे बचने के लिए क्षेत्र के तमाम किसानों ने आधे से ज्यादा गन्ने को खेत में खड़े ही बेचना मुनासिफ समझा। इस दौरान किसान बबलू कुमार ने बताया कि यदि किसान ऐसा नहीं करते तो खेती में लगी पूंजी भी डूब जाती। ऊपर से बिहार सरकार के द्वारा गन्ने की खेती को लेकर किसी भी प्रकार के अनुदान की व्यवस्था नहीं है।
किसानों की क्या है मांग?
क्षेत्र के किसानों की मांग है कि सरकार इन्हें आर्थिक मदद के साथ ही बाजार भी उपलब्ध कराये। बड़ा बाजार नहीं मिलने के कारण किसानों को कम रेट पर अपना उत्पाद बेचना पड़ता है। इस राबा और गुड़ का थोक मूल्य अभी एक हजार रुपये क्विंटल है। जबकि खुदरा बाजार में राबा 70 रुपए किलो बेचा जाता है। पिछले 25 साल से खेती कर रहे किसानों आजतक किसी तरह का सरकारी लाभ नहीं दिया गया है। फसल खराब हो जाने पर बीमा का भी लाभ इन्हें नहीं मिलता है। किसानों ने जिला प्रशासन से पहल कर सरकारी मदद दिलाने की मांग की है ताकि गन्ना उत्पादकों को राहत मिल सके।

Back to top button
error: Content is protected !!