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महिला सशक्तिकरण से कितनी सशक्त हुई महिलाएं? सामाजिक-पारिवारिक और वैचारिक बदलाव के बिना व्यर्थ है महिला सशक्तिकरण

Sheikhpura: निसंदेह सहजता से हर एक दिन भिन्न-भिन्न भूमिकाएं जीते हुए, महिलायें किसी भी समाज का स्तम्भ है। हमारे आस पास महिलायें, सहृदय बेटियां, संवेदनशील माताएं, सक्षम सहयोगी और अन्य कई भूमिकाओं को बड़ी कुशलता व सौम्यता से निभा रहीं है। लेकिन आज भी दुनिया के कई हिस्सों में समाज उनकी भूमिका को नजरअंदाज करता है। इसके चलते महिलाओं को बड़े पैमाने पर असमानता, उत्पीड़न, वित्तीय निर्भरता और अन्य सामाजिक बुराइयों का खामियाजा सहन करना पड़ता है। सदियों से ये बंधन महिलाओं को पेशेवर व व्यक्तिगत ऊंचाइयों को प्राप्त करने से अवरुद्ध करते रहे हैं।

महिला सशक्तिकरण को परिभाषित करती महिला
हम पढ़ी-लिखी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर महिला को हर तरह से सशक्त और सफल मान लेते हैं। पर क्या महिलाओं के सशक्तिकरण का पक्ष मात्र आर्थिक रूप से सशक्त होना ही है? धन उपार्जन तो यूं भी महिलाएं हमेशा से ही करती आई हैं। आज भी गांव में खेती-बाड़ी में महिलाएं पुरुषों से कहीं ज्यादा श्रम करती हैं। जिसके चलते प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अर्थोपार्जन में उनकी भागीदारी है और सदा से ही रही है। उदाहरण के तौर पर तस्वीर में ठेले पर सब्जी बेच रही महिला कारी देवी को ही देख लीजिये। बरबीघा प्रखंड के काजी फत्तूचक गांव की निवासी कारी देवी 3 बेटा और 4 बेटी की माँ हैं। इनके पति नंदे पासवान बनारस में मजदूरी करते हैं। यहां वो परिवार के साथ-साथ अपने सातों बच्चों को संभालती हैं। साथ ही समय निकालकर गांव या फिर बगल के गांव में घूम-घूमकर ठेले पर सब्जी बेचती हैं। इन्होंने बताया कि इस कार्य से उन्हें औसतन 300 रुपये की कमाई हो जाती है। अब जरा सोचिए! कौन अधिक श्रम करता है। कारी देवी या उनका पति?

सोच बदले बिना व्यर्थ है चौखट से चौपाल तक आने का सफर
सशक्त महिला, सशक्त समाज’ देश के विकास में दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं। देश में महिलाओं का सशक्तिकरण होना आज की महती आवश्यकता है। भारत में महिलाएं शिक्षा, राजनीति, मीडिया, कला व संस्कृति, सेवा क्षेत्रों, विज्ञान व प्रौद्योगिकी आदि के क्षेत्र में भागीदारी करती हैं। भारत का संविधान भी सभी भारतीय महिलाओं की समानता की गारंटी देता है। पर कभी-कभी लगता है कि हमारे आस-पास बहुत कुछ बदल तो रहा है, पर ये बदलाव सतही ज्यादा हैं। महिलाएं कामकाजी तो बन रही हैं पर सुरक्षित घर लौट आने की गारंटी नहीं है। एक पढ़ी-लिखी मां भी बेटी को जन्म देने का निर्णय खुद नहीं कर सकती। महिलाएं पंच- सरपंच बन भी जाए तो क्या? अगर उन्हें निर्णय लेने का अधिकार ही ना मिले। या फिर उनके इन अधिकारों को घर के लोग ही छीन लें। ऐसे में सरकारी नीतियां कहां तक सफल हो पाएंगीं? सरकार महिलाओं को हक तो दे सकती हैं पर जब तक उनके अपनों की सोच में परिवर्तन नहीं आता, उनका चौखट से चौपाल तक आने का सफर व्यर्थ है।

सामाजिक-पारिवारिक और वैचारिक बदलाव भी जरूरी
इनके हित जो बदलाव आए हैं, वे भी पूरी तरह से महिलाओं के पक्ष में ही हों ऐसा नहीं है। इसीलिए वैचारिक बदलाव जब तक हमारे व्यव्हार का हिस्सा नहीं बनेंगे, तब तक महिला सशक्तिकरण का नारा बस खेल ही बन कर रह जाएगा। देश में ना तो महिलाओं को सशक्त बनाने वाली सरकारी योजनाओं की कमी है और ना ही स्त्री विमर्श करने वालों की। फिर भी लगता है कि जो कुछ भी हो रहा है, वह व्यवहारिक जीवन में हमारे आसपास के परिवेश में नजर नहीं आ रहा है। कुछ योजनाएं और जागरूक करने वाले विज्ञापन समाज में महिलाओं की स्थिति ना तो बदल पाए हैं और ना ही बदल पाएंगे। अगर सामाजिक-पारिवारिक और वैचारिक बदलाव आए तो शायद महिलाओं की समस्याएं कुछ कम हों।

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