Bihar News: बिहार विधानसभा में सांख्यिकी स्वयंसेवकों का मुद्दा गरमाया, माले ने नीतीश सरकार को घेरा, बहाली की मांग तेज
13 साल से लंबित मांग, माले ने नीतीश सरकार को घेरा, बहाली और नियमितीकरण की मांग तेज, विपक्ष ने उठाए सवाल।
Bihar News: बिहार विधानसभा में आज फिर से सांख्यिकी स्वयंसेवकों (एएसवी) की बहाली और नियमितीकरण का मुद्दा जोर-शोर से उठा। वर्षों से बेरोजगारी का सामना कर रहे इन कर्मचारियों की आर्थिक स्थिति खराब होने की शिकायत के बीच विपक्षी दलों ने नीतीश कुमार सरकार पर तीखा हमला बोला। विधायकों ने सरकार से सवाल किया कि एक ओर जहां रोजगार और एक करोड़ नौकरियों का दावा किया जा रहा है, वहीं हजारों सांख्यिकी कर्मी बेरोजगार क्यों पड़े हैं? वित्त विभाग के मंत्री विजेंद्र यादव ने सदन में जवाब देते हुए स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की, लेकिन विपक्ष संतुष्ट नहीं दिखा। यह मुद्दा बिहार की राजनीति में फिर से गरमाने लगा है, जहां इन कर्मचारियों की लंबित मांगें चुनावी साल में बड़ा मुद्दा बन सकती हैं।
बिहार में सांख्यिकी विभाग के तहत कार्यरत स्वयंसेवक लंबे समय से अपनी सेवा की स्थायी बहाली की मांग कर रहे हैं। ये कर्मचारी मुख्य रूप से जनगणना, सर्वेक्षण और सांख्यिकी संग्रह से जुड़े कार्य करते थे। 2012-13 में पात्रता परीक्षा और पैनल के आधार पर इनकी नियुक्ति हुई थी। इन्हें प्रशिक्षण दिया गया और कुछ वर्षों तक काम लिया गया, लेकिन 2016 में पैनल रद्द कर दिया गया। इसके बाद से ये बेरोजगार हैं और आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं। कई परिवारों में ये एकमात्र कमाने वाले थे, जिससे उनकी स्थिति और खराब हुई है।
विधानसभा में क्या-क्या हुआ?
विधानसभा सत्र के दौरान भाजपा विधायक कृष्णनंदन पासवान ने सबसे पहले इस मुद्दे को उठाया। उन्होंने कहा कि सैकड़ों सांख्यिकी स्वयंसेवक आज बेरोजगार हो चुके हैं। सरकार रोजगार देने का दावा करती है, लेकिन इन कर्मचारियों की बहाली पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा। पासवान ने मांग की कि पुराने पैनल को बहाल किया जाए और इनकी सेवा नियमित की जाए।
इसके बाद माले विधायक संदीप सौरभ ने भी सदन में जोरदार तरीके से मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि सरकार ने बहाली के समय ही स्पष्ट कर दिया था कि कभी भी इन्हें हटाया जा सकता है। 2012-13 में वैकेंसी निकालकर पैनल तैयार किया गया, प्रशिक्षण दिया गया और दो साल काम लिया गया। लेकिन 2014 से काम बंद कर दिया गया और 2016 में पैनल रद्द कर दिया गया। संदीप सौरभ ने सरकार से पूछा कि 13 वर्षों से बेरोजगार इन कर्मचारियों का क्या होगा? सरकार की रोजगार नीति में इनका कोई स्थान क्यों नहीं है?
वित्त विभाग के मंत्री विजेंद्र यादव ने जवाब में कहा कि सरकार इस मुद्दे को गंभीरता से देख रही है। उन्होंने सदन को बताया कि बहाली के समय ही शर्तें स्पष्ट थीं कि सेवा अस्थायी हो सकती है। फिर भी, विभाग द्वारा स्थिति का अध्ययन किया जा रहा है। मंत्री ने आश्वासन दिया कि उचित कदम उठाए जाएंगे, लेकिन कोई ठोस समयसीमा या योजना नहीं बताई गई। विपक्ष ने इसे असंतोषजनक करार दिया और कहा कि सरकार सिर्फ टालमटोल कर रही है।
सांख्यिकी स्वयंसेवकों की पृष्ठभूमि और मांगें
बिहार में सांख्यिकी स्वयंसेवक मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में जनगणना, आर्थिक सर्वे, कृषि सांख्यिकी और अन्य डेटा संग्रह के कार्य करते थे। इनकी नियुक्ति ब्लॉक और जिला स्तर पर होती थी। 2016 के बाद पैनल रद्द होने से हजारों परिवार प्रभावित हुए। ये कर्मचारी अब संगठित होकर प्रदर्शन कर रहे हैं और ज्ञापन सौंप रहे हैं।
उनकी प्रमुख मांगें हैं:
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पुराने पैनल की बहाली और नियमितीकरण।
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बकाया वेतन और लाभों का भुगतान।
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नई भर्ती में प्राथमिकता।
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आर्थिक सहायता या वैकल्पिक रोजगार।
कई संगठन जैसे सांख्यिकी स्वयंसेवक संघ इस मुद्दे को उठा रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी यह चर्चा तेज है, जहां पूर्व विधायकों और कार्यकर्ताओं ने सरकार से त्वरित कार्रवाई की मांग की है।
राजनीतिक नजरिया और प्रभाव
यह मुद्दा बिहार की राजनीति में संवेदनशील है क्योंकि ये कर्मचारी मुख्य रूप से ग्रामीण और पिछड़े वर्ग से आते हैं। नीतीश सरकार पर विपक्ष का आरोप है कि वह बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन छोटे-मोटे मुद्दों पर असंवेदनशील है। भाजपा और माले जैसे दल इसे बेरोजगारी के बड़े मुद्दे से जोड़कर सरकार पर दबाव बना रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार जल्द कोई ठोस कदम नहीं उठाती तो यह आंदोलन बड़ा रूप ले सकता है। पिछले वर्षों में भी इसी तरह के मुद्दों पर प्रदर्शन हुए हैं। बजट सत्र चल रहा है, ऐसे में विपक्ष इसे और उछाल सकता है।
सरकार की ओर से क्या संकेत?
वित्त मंत्री के जवाब से लगता है कि सरकार मुद्दे से अनभिज्ञ नहीं है। विभाग स्तर पर चर्चा चल रही है। कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया है कि पुराने कर्मचारियों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था पर विचार हो सकता है, लेकिन कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पहले भी बेरोजगारी कम करने के कई कदम उठाए हैं, जैसे नई भर्तियां और स्किल डेवलपमेंट। लेकिन सांख्यिकी स्वयंसेवकों का मामला लंबित है।
Bihar News: उम्मीद की किरण या निराशा?
बिहार विधानसभा में उठा यह मुद्दा हजारों परिवारों की उम्मीदों से जुड़ा है। विपक्ष की ओर से लगातार दबाव और सरकार की ओर से आश्वासन के बीच इन कर्मचारियों को इंतजार जारी है। यदि सरकार सकारात्मक कदम उठाती है तो यह बेरोजगारी के खिलाफ एक अच्छा संदेश होगा। अन्यथा, यह राजनीतिक विवाद का नया केंद्र बन सकता है। फिलहाल, सांख्यिकी स्वयंसेवक संगठित होकर अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं और सदन से निकली बहस उनके संघर्ष को नई ताकत दे रही है।



