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Bihar News: कैमूर में जीविका दीदियों की सफलता की नई कहानी, मशरूम खेती से कम लागत में लाखों की कमाई, आत्मनिर्भरता की ओर मजबूत कदम

मशरूम खेती से लाखों की कमाई, कम लागत-कम समय, रामपुर प्रखंड की महिलाएं आत्मनिर्भर बनीं, जीविका प्रशिक्षण ने बदली तस्वीर।

Bihar News: बिहार के कैमूर जिले के रामपुर प्रखंड में जीविका दीदियां मशरूम की खेती को अपना करियर बनाकर आत्मनिर्भरता की नई मिसाल पेश कर रही हैं। कम जगह, कम समय और न्यूनतम लागत में बटन (बटर) और ऑयस्टर (आयस्टर) मशरूम उगाकर ये महिलाएं न केवल अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत कर रही हैं, बल्कि परिवार की जिम्मेदारियां भी संभाल रही हैं। जीविका परियोजना के तहत मिले प्रशिक्षण और सहायता ने इन ग्रामीण महिलाओं के जीवन में क्रांतिकारी बदलाव लाया है। स्थानीय स्तर पर मशरूम की बढ़ती मांग ने उन्हें बाजार की चिंता से मुक्त कर दिया है, जहां व्यापारी खुद गांव पहुंचकर उत्पाद खरीद ले जाते हैं।

बिहार सरकार की जीविका योजना महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़ने में अहम भूमिका निभा रही है। रामपुर प्रखंड के विभिन्न पंचायतों जैसे कुडारी, जलालपुर, पसाई और खरेंदा में दर्जनों महिलाएं इस खेती से जुड़ी हैं। ये महिलाएं पहले केवल घरेलू कार्यों तक सीमित थीं, लेकिन अब स्वतंत्र कमाई से उनका आत्मविश्वास बढ़ा है। मशरूम की खेती घर के किसी भी अंधेरे कमरे में आसानी से की जा सकती है, जिससे महिलाओं को बाहर जाने की जरूरत नहीं पड़ती। यह खेती पारंपरिक फसलों जैसे धान-गेहूं की तुलना में अधिक लाभदायक साबित हो रही है।

मशरूम खेती की विशेषताएं और लाभ

मशरूम की खेती बिहार जैसे राज्य में विशेष रूप से फायदेमंद है क्योंकि इसमें पानी, जगह और समय की कम जरूरत पड़ती है। बटन मशरूम और ऑयस्टर मशरूम दोनों ही पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं, जिसमें प्रोटीन, विटामिन और मिनरल्स प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में पोषण की कमी को दूर करने में भी यह सहायक सिद्ध हो रहा है। एक चक्र में मात्र 2-3 महीने में फसल तैयार हो जाती है, जिससे साल में कई बार उत्पादन संभव है।

रामपुर प्रखंड में जीविका दीदियों ने छोटे स्तर से शुरुआत की। प्रशिक्षण के बाद उन्होंने स्पॉन (बीज) और अन्य सामग्री प्राप्त की। शुरुआती निवेश कम होने से जोखिम भी न्यूनतम रहता है। स्थानीय बाजार में मशरूम की कीमत 150-200 रुपये प्रति किलो तक पहुंच रही है, जिससे प्रति महीने अच्छी कमाई हो रही है। कई महिलाओं ने बताया कि अब वे घर की छोटी-मोटी जरूरतों के लिए किसी पर निर्भर नहीं रहतीं।

सफल महिलाओं की कहानियां

कुडारी पंचायत के सिसवार गांव की किरण देवी पिछले तीन महीनों से बटन मशरूम की खेती कर रही हैं। जीविका समूह की बैठकों में मिले प्रशिक्षण ने उन्हें तकनीकी जानकारी दी। शुरू में थोड़ी हिचकिचाहट थी, लेकिन अब नियमित उत्पादन से वे खुश हैं। किरण कहती हैं, “पहले परिवार चलाना मुश्किल था, लेकिन अब मशरूम बेचकर अच्छी कमाई हो रही है।”

इसी तरह जलालपुर पंचायत की तेतरा देवी, पाली गांव की परमिला देवी और कांति देवी भी बटन मशरूम उगा रही हैं। उन्होंने बताया कि पहले केवल घर संभालना ही उनका काम था, लेकिन अब स्वरोजगार से जुड़कर जीवन में नई ऊर्जा आई है। पसाई पंचायत के माझियाव गांव की सुनीता देवी और खरेंदा पंचायत के हुडरा गांव की लीलावती देवी ऑयस्टर मशरूम की खेती कर रही हैं। उनका कहना है कि ऑयस्टर मशरूम की खेती अपेक्षाकृत आसान है और कम समय में रिटर्न मिल जाता है। तीन महीने में ही लाभ दिखने लगा है।

ये महिलाएं अब जीविका की बैठकों में अन्य सदस्यों को भी इस खेती से जुड़ने के लिए प्रेरित कर रही हैं। उनकी सफलता से प्रखंड के अन्य गांवों में भी महिलाएं आगे आ रही हैं।

जीविका परियोजना की भूमिका और सहायता

जीविका बिहार ग्रामीण आजीविका परियोजना महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए काम कर रही है। रामपुर प्रखंड में ब्लॉक प्रोजेक्ट मैनेजर (बीपीएम) अनिल कुमार चौबे ने बताया कि मशरूम उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। महिलाओं को स्पॉन, खाद, तकनीकी मार्गदर्शन और कभी-कभी अनुदान भी उपलब्ध कराया जाता है। योजना का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाना है।

बीपीएम चौबे ने कहा, “जीविका का लक्ष्य महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना है। मशरूम खेती इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। आने वाले समय में और अधिक समूहों को जोड़ा जाएगा तथा विपणन व्यवस्था को मजबूत करने के प्रयास किए जाएंगे।” जीविका ने पूरे बिहार में हजारों महिलाओं को विभिन्न व्यवसायों से जोड़ा है, लेकिन मशरूम खेती कैमूर जैसे क्षेत्रों में तेजी से लोकप्रिय हो रही है।

बिहार में मशरूम उत्पादन बढ़ रहा है। राज्य सरकार अनुदान और प्रशिक्षण देकर इस क्षेत्र को प्रोत्साहन दे रही है। कई जिलों में सफल मॉडल स्थापित हो चुके हैं, जहां महिलाएं महीने में 10-15 हजार रुपये तक कमा रही हैं। कैमूर में भी यह ट्रेंड तेजी से फैल रहा है।

चुनौतियां और भविष्य की संभावनाएं

हालांकि मशरूम खेती लाभदायक है, लेकिन शुरुआत में तकनीकी जानकारी की कमी और बाजार पहुंच जैसी चुनौतियां रहती हैं। जीविका इन समस्याओं को दूर करने में मदद कर रही है। महिलाओं को क्लस्टर बनाकर उत्पादन बढ़ाने और सामूहिक बिक्री पर जोर दिया जा रहा है। इससे लागत कम होगी और लाभ अधिक।

भविष्य में कैमूर जिला मशरूम उत्पादन का हब बन सकता है। यदि विपणन और प्रसंस्करण की व्यवस्था मजबूत हुई तो महिलाओं की आय कई गुना बढ़ सकती है। मशरूम से बने उत्पाद जैसे अचार, पाउडर आदि भी बाजार में बेचे जा सकते हैं।

Bihar News: महिलाओं की सशक्तिकरण की मिसाल

रामपुर प्रखंड की जीविका दीदियां मशरूम खेती से न केवल अपनी तकदीर बदल रही हैं, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए प्रेरणा स्रोत बन रही हैं। कम संसाधनों में अधिक मुनाफा देने वाली यह खेती ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रही हैं। बिहार सरकार की योजनाएं यदि इसी तरह जारी रहीं तो ग्रामीण महिलाओं का भविष्य उज्ज्वल होगा। ये दीदियां साबित कर रही हैं कि मेहनत और सही दिशा मिले तो कोई भी सपना असंभव नहीं।

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