UGC New Rule 2026: सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के नए इक्विटी नियमों पर लगाई रोक: प्रोमोशन ऑफ इक्विटी रेगुलेशंस 2026 पर स्टे, केंद्र सरकार और यूजीसी से मांगा जवाब
CJI सूर्यकांत की पीठ ने UGC समानता नियमों पर स्टे, कहा - "क्या हम प्रतिगामी समाज बन रहे हैं?", केंद्र-UGC से मांगा जवाब
UGC New Rule 2026: उच्च शिक्षा में समानता बढ़ाने के नाम पर यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (यूजीसी) द्वारा जारी नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने ‘प्रोमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस 2026’ पर तुरंत रोक लगा दी है। कोर्ट ने कहा कि ये नियम प्रथम दृष्टया अस्पष्ट हैं और इनके दुरुपयोग की आशंका है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस ज्योमाल्या बागची की बेंच ने यह आदेश दिया। कोर्ट ने केंद्र सरकार और यूजीसी से जवाब मांगा है। अगली सुनवाई 19 मार्च 2026 को होगी। तब तक 2012 के पुराने नियम लागू रहेंगे।
नए नियम क्या थे और क्यों विवाद
यूजीसी ने 23 जनवरी 2026 को ये नए नियम जारी किए थे। इनका नाम ‘प्रोमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस 2026’ है। नियमों का उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव रोकना और समानता बढ़ाना था। इनमें एससी, एसटी और ओबीसी छात्रों को विशेष सुरक्षा और समानता के प्रावधान थे। लेकिन याचिकाकर्ताओं ने इन्हें भेदभावपूर्ण, मनमाना और संविधान के खिलाफ बताया। उनका कहना था कि ये नियम सामान्य वर्ग के छात्रों को सुरक्षा से वंचित करते हैं। नियमों में सेक्शन 3(C) को मुख्य रूप से चुनौती दी गई। इस सेक्शन में जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा दी गई थी, जिसे याचिकाकर्ताओं ने असंवैधानिक और अस्पष्ट बताया।
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य अवलोकन
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने नियमों की भाषा पर सवाल उठाए। जस्टिस ज्योमाल्या बागची ने कहा, “रेगुलेशन में इस्तेमाल किए गए शब्दों से ऐसा लगता है कि इनका दुरुपयोग हो सकता है।” चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने टिप्पणी की, “हम समाज में एक निष्पक्ष और सबको साथ लेकर चलने वाला माहौल बनाना चाहते हैं।” कोर्ट ने पूछा, “जब पहले से ही 3 ‘E’ (समानता, शिक्षा, उत्थान) मौजूद हैं, तो फिर 2 ‘C’ (कास्ट, कम्युनिटी) की क्या जरूरत?” कोर्ट ने कहा कि नियम बहुत व्यापक हैं और इनसे समाज में विभाजन हो सकता है। अमेरिका जैसे देशों में अलग-अलग स्कूलों की स्थिति का जिक्र कर कोर्ट ने चेतावनी दी कि भारत में ऐसा नहीं होना चाहिए।
कोर्ट ने नियमों को ‘वैग’ (अस्पष्ट) और ‘कैपेबल ऑफ मिसयूज’ (दुरुपयोग योग्य) बताया। इसलिए इन्हें तुरंत रोक लगाई गई। कोर्ट ने आर्टिकल 142 के तहत आदेश दिया कि 2012 के पुराने नियम ही लागू रहेंगे। केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी किया गया है। जवाब दाखिल करने के लिए समय दिया गया है।
याचिका दायर करने वाले और दलीलें
याचिकाकर्ताओं में मृत्युंजय तिवारी, विनीत जिंदल और राहुल देवन जैसे लोग शामिल थे। उनके वकील विष्णु शंकर जैन ने दलील दी कि सेक्शन 3(C) सिर्फ एक धारणा पर आधारित है कि सामान्य श्रेणी के छात्र भेदभाव करते हैं। यह यूजीसी एक्ट 1956 की धारा 3(C) का उल्लंघन है। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि नियम संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और 15 (भेदभाव निषेध) के खिलाफ हैं। ये नियम उच्च शिक्षा में आरक्षण जैसी सुविधा सिर्फ एससी, एसटी, ओबीसी को देते हैं, जबकि सामान्य वर्ग को बाहर रखते हैं। इससे संस्थानों में विभाजन बढ़ सकता है।
नियमों का पृष्ठभूमि और विरोध
ये नियम उच्च शिक्षा में जाति आधारित भेदभाव रोकने के लिए लाए गए थे। लेकिन जारी होने के बाद देशभर में विरोध हुआ। सामान्य वर्ग के छात्रों और संगठनों ने इन्हें भेदभावपूर्ण बताया। कई जगह प्रदर्शन हुए। विरोधियों का कहना था कि ये नियम संस्थानों में एकता के बजाय विभाजन पैदा करेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने विरोध को गंभीरता से लिया और तुरंत सुनवाई की। कोर्ट ने कहा कि नियमों की वैधता और संवैधानिकता की जांच होनी चाहिए।
UGC New Rule 2026: आगे क्या होगा
अगली सुनवाई 19 मार्च 2026 को होगी। तब तक नए नियम लागू नहीं होंगे। केंद्र सरकार और यूजीसी को नए सिरे से नियम ड्राफ्ट करने या स्पष्टीकरण देने का मौका मिलेगा। यह फैसला उच्च शिक्षा में समानता और भेदभाव रोकने की नीतियों पर बड़ा असर डालेगा। छात्रों, शिक्षकों और संस्थानों में राहत की भावना है क्योंकि पुराने नियम जारी रहेंगे। लेकिन एससी, एसटी, ओबीसी छात्रों के संगठनों में निराशा है। वे कहते हैं कि भेदभाव रोकने के प्रयास रुक गए।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला संतुलित और निष्पक्ष समाज बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि समाज में एकता और सबको साथ लेकर चलना जरूरी है। आगे की सुनवाई में नियमों की गहराई से जांच होगी। उच्च शिक्षा में समानता सुनिश्चित करने के लिए नए सिरे से सोचने की जरूरत है।



